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मंगलवार, 30 जुलाई 2019

नारी ज़ात के लोथड़े को पुरुष ज़ात के गिद्ध नोंचते मिले



थक गयी  जब मैं,
 शब्दों  की  बे-बाकी  से,
ख़ामोशी की राह चुनी, 
तय हुआ
 चलने से पहले, 
 ख़ामोश रहूँगी 
 मरने से पहले, 
कुछ सुनूँगी न कहूँगी
बस ठूँठ बन चलती रहूँगी, 
सफ़र के  हमसफ़र बने ,
  कुछ  एहसास ,
थकते-थकाते ,
रूठते-मनाते ,
डग साँसों  की  भरते,
जीवन के पड़ाव को , 
उस पार पहुँचाने का वादा किया, 
अवाक रह गयी  !
जब एक जंगल में  भटक गयी ,
रूह  काँप  गयी  जब,
लुप्त हो चुके,
 पुरुष-ज़ात  के  गिद्ध ,
न जाने कहाँ से ?
नारी ज़ात के लोथड़ों  को नोंचते मिले !
कुछ सुडोल काय ,
 कुछ हड्डियों के पिंजर, 
क्षीण हो चुकी शक्ति, 
साँसों से झूझते ,
अपने ही अस्तित्त्व की, 
भीख माँगते मिले, 
तप रहा तन,
काल की भट्ठी पर,
सिहर गयी जब वह,  
ख़ामोशी से जलते मिले, 
व्यवस्था के नाम पर
 कुछ अवसरवादी  कौवे,
काँव-काँव करते,
आपस में झगड़ते मिले, 
 ख़ामोश  रही  क्योंकि 
मैं  सुरक्षित  हूँ  ?
उसी जंगल के एक कोने में,
अपनी ही साँसों की गिनती में,
परन्तु अब मेरी भी साँसें ,
किसी के अधीन मिलीं  !

-  अनीता सैनी 

सोमवार, 29 जुलाई 2019

हाँ यह वही सावन है



ज़ुल्म ! पवन के अल्हड़ झोंकों का,
कि  घटाएँ फिर ज़हन  में  उमड़  आयीं,
 चित्त ने दी चिंगारी,
एहसास फिर स्वप्न में सुलग आये, 
 भरी बरसात में जला,
  हाँ  यह  वही  सावन  है |


न धुँआ उठा, न धधका तन,
सपनों का वही जौहर है, जो  बेशुमार  जला,
बेलोश बेचैनियों में सिमटा बेसुध, 
प्रति पल  अलाव-सा जला,
हाँ  यह वही सावन है |

कुछ बुझा-सा,
कुछ  ना-उम्मीदी  में जला,
डगमगा रहे क़दम,
 फिर  ख़ामोशी से चला,
जीवन के उस पड़ाव पर,
सिसकियों ने सहलाया,
 हाँ  ता-उम्र जला यह वही सावन है |

 पलकों को भिगो ,
मुस्कुराहट के चिलमन  में  उलझ ,  
दिल के चमन को बंजर कर गया ,
 हसरतों का खिला फूल,
शोहरत  का  दे  लिबास,
भरी  महफ़िल में,
 अरमानों संग जला,
हाँ यह वही सावन है |


बेरहम भाग्य को भी न आया रहम,
 रूह-सा  रूह  को  तरसता मन,
एक अरसे तक सुलगा,
फिर भी न हुआ कम,
पेड़ की टहनियों से छन-छनकर जला,
हाँ  यह वही सावन है |

- अनीता सैनी

शनिवार, 27 जुलाई 2019

भारत के पूर्व राष्ट्रपति, महान लेखक, वैज्ञानिक 'भारतरत्न' डॉ. ए.पी.जे.अब्दुल कलाम 'मिसाइल-मेन' जी को उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धासुमन अर्पित करती हूँ |



सादगीपूर्ण  जीवन, 
 ज़िंदगी  का  सार  समझाता   है, 
भारत का महान सपूत,
 हमें जीवन की राह  दिखाता  है |

समर्पण की परिभाषा,
 व्यक्तित्व  में  झलकती   है, 
जीवन के हर पहलू में,
 महानता की  महक मिलती है |

इंसान को इंसानियत का पाठ 
विचारों से भविष्य को सतत प्रवाह मिलता  है  ,
कृतित्व  से महकाया दुनिया को, 
  जीवन का आचरण बुलंदियों की राह दिखाता  है |

व्यक्तित्व में झलकता नूर,
 जीवन कोहिनूर-सा चमकता है ,
इंसान के लिबास में,
 धरा पर आया  फ़रिश्ता,
कर्तव्यनिष्ठा का पाठ उनकी  छवि में झलकता है |

- अनीता सैनी 

शुक्रवार, 26 जुलाई 2019

सिगरेट के कस का कमसिन दम



सिगरेट के कस  का  कमसिन दम,
महकते  जीवन  में लगा  कम, 
धुँए   में  उड़ा  ज़िंदगी, 
ज़ालिम धुँए में  गया   रम  |

हर दम पर भरता  था  दम,
जब  नहीं  था  जीवन  में  कोई ग़म,
जरा से कंकड़ क्या मिले,
बन्दे  के लड़खड़ा गये क़दम |

 फ़िक्र कहाँ  ज़िंदगी में नशे के मारों  को,
निगाहों में बस फ़तह ही फ़तह,
उड़ा देते  है  जीवन  धुएँ  में,
बेफ़िक्री फैली हो ज़हन में जिस के हर तरह |


क्षण-क्षण जला सिगार में तन को,
प्रति क्षण किया  खोखला,
देख हड्डियों  के अपने ही पिंजर को ,  
जीवन के अंतिम पड़ाव में  गया  बौखला |

- अनीता सैनी 

बुधवार, 24 जुलाई 2019

कारगिल पर था तिरंगा लहराया



कारगिल पर था तिरंगा लहराया, 
आज फिर वह दिन आया |

क़र्ज़  अदाकर मिट्टी  का,
कर शहादत का शृंगार,
नूर नयन  का  तिरंगे  में  चमकता,
चाँद के उस पार नज़र आया |

हर आहट पर सिहर उठे मन,
 फिर तू यादों में उमड़ आया,
लहराया तिरंगा  जिस शान से, 
वह दृश्य फिर आँखों में उभर आया |

क़ुर्बानी  पर क़ुर्बत यह जन्म,
चौखट पर तेरा चेहरा  नज़र आया ,
शौर्य  को  संभाला दिल ने ,
साँसों में वही जूनून उभर आया |

जज़्बा  अंत  तक  डटे  रहने  का,
वह क़िस्सा मेरी आँखों में चमक आया,
रक्त की होली खेल जब तू आँगन में आया,
 वही  आँगन फिर  रक्ताभ नज़र आया |


आँखें नम , हृदय से नमन,
शहीदों की शहादत को सलाम,
दुआओं  में  फ़रियाद  लिख  भेजूँ, 
 उन हाथों पर राखी  मेरे भी नाम की नज़र आये |
- अनीता सैनी

ख़ामोश रह जाती हूँ मैं



अल्फ़ाज़  की दुनिया में,
अल्फ़ाज़ की मोहताज हूँ  मैं, 
 एहसास धड़कनों में  छिपाये,
ख़ामोशी  में  सिमट जाती हूँ मैं,
शब्दों के भँवर में उलझ,
ख़ामोश रह जाती हूँ मैं |

मधुर स्वर में रिझाना हो ,
कोई गान प्रीत का गाना हो,
रिमझिम बरसती घटाओं को,
गुफ़्तुगू  में उलझाना हो,
शब्दों के भँवर में उलझ,
ख़ामोश रह जाती हूँ मैं |

उसके जाने से पहले, 
उसको  दिल का हाल बताना हो,
पत्थर-दिल नहीं हूँ मैं,
जज़्बात  को शब्दों में पिरोना हो,
शब्दों के भँवर में उलझ,
ख़ामोश रह जाती हूँ मैं |

पहलू में  बैठाकर 
वक़्त का  फ़लसफ़ा सुनाना हो,
ज़ख़्मों को  देनी हो  ज़ुबां,
ज़िंदगी की दास्तां में डूब जाना हो,
शब्दों के भँवर में उलझ, 
ख़ामोश रह जाती हूँ  मैं |

 - अनीता सैनी 

शुक्रवार, 19 जुलाई 2019

एहसास का समुंदर



एहसास के समुंदर में प्रेम की कश्ती, 
मझदार के उस पार पहुँचा दो तो कोई बात हो |

फ़ज़ाओं में पनप रही  नेह की महक,
आशियाना हमारा महका दो तो कोई बात हो |

 ख़ुशगवार  ज़िंदगी  मुठ्ठी में कुछ मायूसी के लम्हे, 
इन्हीं लम्हों को  प्रीत का  झूला झुला दो तो कोई बात हो |

गुज़र गये वो पल एक बार फिर लौटा  दो, 
उन्हीं  पलों में महक तुम्हारी महका दो तो कोई बात हो |

वक़्त के थपेड़ों से यूँ घबराया  न करो,  
इन्हीं थपेड़ों  में मशाल प्रीत की जला दो तो कोई बात हो |

एहसास के अनगिनत मोती धारण किये साँसों पर, 
इन्हें छूकर तुम  कोहिनूर बना  दो तो कोई बात हो |

- अनीता सैनी 

गुरुवार, 18 जुलाई 2019

खेतीहर अब रो रहा,



जब से अपने देश में, आया पूँजीवाद।
कहर काल का पड़ गया, निर्धन है लाचार।।
--
खेतीहर अब रो रहा, पसरा अत्याचार।
धनपतियों के साथ में, देश हुआ लाचार।।
--
खेतीहर अब मल रहा, अपने खाली हाथ।
लाचारी को लाँघता, ढूँढे सुख का साथ।।
--
चौमासे की झड़ी में, खिले चमन में फूल।
पानी-पानी सब जगह, उड़े कहाँ से धूल।।
--
अपना भारत देश है, सभी तरह समृद्ध।
अब भी है परिवार के, मुखिया सारे वृद्ध।।
--
होता है विज्ञान का, कुदरत से जब मेल।
सुख से सारे लोग तब, खेलें  अपना खेल।।

- अनीता सैनी 

बुधवार, 17 जुलाई 2019

समय के भँवर में उलझ गया मन



समय  के  भँवर  में उलझ गया  मन
जाने   क्यों   अकुलाई  मैं  ?  
चेतना  चित  की  चहक  उठी ,
जाने  क्यों  शरमाई  मैं ? 

 सुघड़  भाव  बँधे आँचल से,
लगी  प्रीत  की  गाँठ,
कैसे सजन सम्भालूँ मन  को ?
 मन  सिसके  पहर   आठ |

पी  प्रीत  में  हारी  मन  को, 
समझो  मन   की   बात, 
सुबह-शाम मन बींधे मन को,
उलाहना   देती   रात |

लाज-शर्म  में  डूब  गया   मन, 
 हुई  न  चौखट  पार, 
बढ़ते  क़दमों को रोक रहा मन,
खुले  न  मन  के  द्वार |

जीवन पथ पर हार गया मन ,
थामों  मन  का  हाथ, 
जरा-जरा सी बातों पर न रुठो,
न   छोड़ो  मन   का  साथ |

- अनीता सैनी 

मंगलवार, 16 जुलाई 2019

बेटी सुख का सार


बेटी  घर संसार में, है सबसे अनमोल।

इसको ऐ नादान तू, सिक्कों में मत तोल।।

--

बेटी को इस जगत में, बेटा कहा पुकार।

जगदम्बा  का  रूप है, बेटी तो उपहार।।

--

बेटी बतलाती हमें, ख़ुशीयों  का सब सार।

बेटी के बिन मनुज का, जीवन है बेकार।।

--

बेटी जैसे शब्द की, महिमा बहुत महान।

बेटी ही सम्मान है, करुणा की पहचान।।

--

बेटी सुख का सार है, बेटी ही शृंगार।

बेटी के कारण बसे, छोटा-सा संसार।।

--

बेटी को मत त्यागिए, ये जीवन का सार।

बेटी ममतारूप है, क़ुदरत का उपहार।


   - अनीता सैनी 

श्री गुरुवै नमः



आशा का दीपक जला, गुरु का करना ध्यान।
तब ही होगी ज्ञान की, राह बहुत आसान।।
--
कठिन राह में जो हमें, चलना दे सिखलाय।
गुरु की भक्ति से यहाँ, सब सम्भव हो जाय।।
--
गुरु की महिमा का करें, कैसे शब्द बखान।
जाकर के गुरुधाम में, मिलता हमको ज्ञान।।
--
मन की कोटर में रखो, हरदम गुरु का रूप।
गूँगे को मिलते जहाँ, शब्द-रूप अनुरूप।। 
--
गुरु की अनुकम्पा अदृश, करो गुरू का मान।
आगे बढ़ने के  लिए, सीख गुरू से ज्ञान।।

 - अनीता सैनी

रविवार, 14 जुलाई 2019

द्वंद्व




हृदय  की  अगन  से  आहत  न होना,  
उस पल को थाम मुठ्ठी में तुम  ज़िक्र मेरा करना,
उभरेगा  अक्स  आँखों  में,
 नीर  बना  उसे  ना  बहाना,  
वक़्त को थमा अँगुली, 
 हिम्मत उठा कंधों पर,डग जीवन के भरना |

बहता  बहुत जुनून  साँसों में, 
 प्रति पल यही एहसास सजाना,  
भरसक भ्रम भरा है भारी मन में,
 तू इससे पार उतरना,
चित की चेतना पर मर्म मायूसी का, 
मकरंद ! तुम मन मलिन  न करना |

मिलूँगी जीवन के हर मोड़ पर,
बन शीतल जल की प्याऊ,
उस एहसास को तुम,साँसों में समा लेना, 
स्नेह से सींचा है वृक्ष वक़्त  का, 
ठंडे  झोंकों को आग़ोश में भर,
जीवन नैया  को पार तुम लगाना |

अंतरमन में उठेगी झंकारे,
तुम ख़ामोशी से सुनना,
निशा नयनों में भर देगी  ज्योति,
तुम चेतना के चित्त पर मकां अपना बनाना |

- अनीता सैनी 

गुरुवार, 11 जुलाई 2019

सुनो ! सावन तुम फिर लौट आना



 सुनो ! सावन तुम फिर लौट आना,

फिर महकाना मिट्टी को,

डाल-डाल पर पात सजाना, 

फिर बरसाना, बरखा  रानी  को |



पी  प्रीत  में  पूछूँ  प्रति  पल ,

अधर-विश्वास  न  देना  तुम ,

हँसी  अधरों  पर  लेते  आना ,

न  मायूसी  से  मिलना  तुम |



 चंचला  की  चमक  से, 

घटाएँ  गगन  पर  फिर  फैलाना,

इंद्रधनुष  के  रंगों  से , 

आँचल साँझ  का तुम  चमकाना  |


सुनो ! सावन तुम साथ निभाना, 

 लौट आना  तुम  पी  के  साथ, 

आँगन  फूलों  से  फिर  भर  देना, 

 जब  हों   चौखट पर  मेरे  नाथ |


कोयल की मीठी कूक ले आना, 

साथ पवन के अल्हड़ झोंकों को,

राह  निहारुँ   पल-पल तेरी ,

भूल न जाना आने को |

- अनीता सैनी 

बुधवार, 10 जुलाई 2019

कल्पित कविता कल्पनालोक ने



हृदय सरगम के निर्मल तारों से , 

अंतरात्मा ने किया भावों को व्यक्त ,

कल्पित कविता कल्पनालोक ने ,

कहीं अनुराग कहीं विरक्त |


कहीं  बिछोह  में  भटकी दर-दर ,

कहीं   अपनों   ने   दुत्कारा ,

नीर  नयन  का  सुख  गया ,

जब उर  ने  उर  को  दुलारा |


करुण  चित्त  का  कल्लोल ,

कल्पना  ने  कल्पा  संयोग ,

शब्द  साँसों  में  सिहर  उठे ,

 जब अंतरमन  से  उलझा वियोग  |


कभी  झाँकती  खिड़की से,

कभी निश्छल प्रेम ने पुकारा,

 कह  अल्हड़  हृदय  का उद्गार, 

जब  जग  ने  दिया  सहारा |


अकेलेपन की अलख से आहत,

ओढ़ा  आवरण  न्यारा ,

 पहनी   पगड़ी   खुद्दारी   की,

  जब कवि ने कविता  को  संवारा |


 - अनीता सैनी

शुक्रवार, 5 जुलाई 2019

ज़िंदगी की किताब



वक़्त  ने   लिखे  अल्फ़ाज़,

ज़िंदगी  की नज़्म  बन  गयी, 

सीने में दबा, साँसों ने लिया संभाल, 

अनुभवों  की  किताब  बन गयी  |


होठों की मुस्कान, 

न भीगे  नम आँखों से,ख़ुशी का आवरण गढ़ गयी,

शब्दों को सींचा स्नेह से,

दर्द में डूबी मोहब्बत,अल्फ़ाज़ में सिमट गयी |


गुज़रे   वक़्त   को, 

आँखों  में किया बंद, लफ़्ज़ ज़िंदगी पढ़ती गयी , 

मिली  मंज़िल  मनचाही, 

हिम्मत  साँसों  में  ढलती गयी  |


 संघर्ष  के  पन्नों  पर, 

अमिट उम्मीद की मसी  फैल  गयी , 

सुख  खिला  संतोष  में,

इंसानियत  की  नींव  रखती   गयी  |


न हृदय को पड़ी,  मैं की  मार, 

न अंहकार से  हुई  तक़रार,

मिली चंद साँसें  उसी  को  जीवन वार,

ज़िंदगी अल्फ़ाज़  में  सिमटी  किताब  बन  गयी |

                

            -  अनीता सैनी 

बुधवार, 3 जुलाई 2019

हृदय का उद्वेग




 हृदय का उद्वेग, 

भावों के उच्च शिखर की,

सीमा को लाँघकर,

त्रासदी बनता हुआ,

गंतव्य की ओर बढ़ता है,

अंतरमन के शब्दों को,

भावनात्मक वेग प्रदानकर,

ध्वनियों से अवतरित अंतरनाद की  मधुर लालिमा में समाहित,

प्रपंचों से दूर,

अधोमुखी स्वरुप में सिमटा हुआ,

 प्रतिपल भावों के वेग को,

तीव्र करता हुआ ,

अंतरात्मा की आवाज़ को इंसानियत के  ओर नज़दीककर,

शब्दों को मुखर रूप प्रदानकर,

अपना अस्तित्व तराशने की,

 चित  में  प्रेरणा का प्रवाहकर

वाणी को मधुरता प्रदानकर,

सृष्टि ने सुशोभित किया,

अंतरात्मा की आवाज़ को |

जबकि मानव लूट रहा,

लुभावने प्रपंचों से,

क्षीणता के कगार पर बैठ,

खंडित कर रहा,

अंतरध्वनि, हृदयपटल पर,

सच कहने और सहने की,

क्षमता से दूर,

गढ़ रहा ढकोसले का मलिन आवरण |


         - अनीता सैनी